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कुतुब मीनार
भारत की राजधानी दिल्ली में स्थित 'कुतुब मीनार' एक प्राचीन स्मारक है। यह विश्व की सबसे ऊँची एतिहासिक इमारतों में से एक है। कुतुब मीनार अपने आप में एक वीरता का मीनार है, जिसको देखने से ऊंचाईयों को छूने की आशा मिलती है, जिसे हिंदू साम्राज्य की हार के बाद शुरू किया गया था।
कुतुब मीनार की नींव कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1199 ई. मे रखवाई और इस स्मारक का नाम भी उन्होने अपने नाम पर रखा। भारत के पहले मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक थे, जिसकी वीरता का शानदार उदाहरण आज भी उपस्थित है। यह भारत का सबसे उँचा इकलौता टॉवर है और एक अफगान शैली का प्रतीक है। यह एक कीर्ति विजय स्तंभ की तरह वहाँ खड़ा है। यह 5 मंजिल की स्मारक है, हर मंज़िल के छज्जों को बारीक बारीक नक्काशी से सजाया गया है। तीन मंज़िल बनने के बाद कुतुबुद्दीन की मृत्यु हो गयी और बाकी की दो मंज़िल उसके उतराधिकारी ने बनाई। पहली 3 मंज़िल लाल बलुआ पत्थर से बनाई गई है और बाद की 2 मंज़िल संगमरमर और बलुआ पत्थर से बनी है। यह पूरी इमारत एक ही पत्थर से बनी है जिसमे न तो कोई सीमेंट है ना ही कोई जोड़ है। यह 72.5 मीटर ऊँची है। पर्यटक इस ऊँची इमारत की ओर आकर्षित होते हैं ओर दूर दूर से इस अद्भुत वीर स्मारक को देखने आते हैं। इसे यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत का दर्जा मिला है।
कुतुब मीनार में कई दिलचस्प संरचनाएं भी हैं जेसे लौह स्तम्भ, अलाई दरवाज़ा, अलाई मीनार, कूव्वतुल-इस्लाम मस्जिद आदि। इसके आँगन के केंद्र मे अद्भुत लौह स्तम्भ मौजूद हैं जो ध्वजा स्तम्भ के रूप मे विष्णु मंदिर का चिन्ह है। यह 7.2 मीटर लंबा लोहा खंबा जिस पर सदियों से कोई जंग मौजूद नही है। जो वर्षो से बारिश, धूल, आँधी, तूफान से खुद ब खुद अपनी रक्षा कर लेता है। ऐसी पवित्रता की पहचान है यह लोहा जिस पर हज़ारो साल बाद भी कोई जंग नही लगी। यह कोई नही जानता कैसे। ऐसा कहा जाता है की अगर कोई अपने उल्टे हाथो से स्तम्भ को घेर लेता है तो उसकी मन्नत ज़रूर पूरी होती है। अर्थात यह मीनार सिर्फ़ जीत के टॉवर के रूप मे नही बनाया गया बल्कि इस्लाम और गुलाम वंश की सैन्य शक्ति के न्याय का प्रतीक है।

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कुतुब मीनार

भारत की राजधानी दिल्ली मे 'कुतुब मीनार' एक प्राचीन स्मारक है। यह विश्व की सबसे ऊँची एतिहासिक इमारतों मे से एक है। कुतुब मीनार अपने आप मे एक वीरता का मीनार है, जिसको देखने से ऊंचाईयों को छूने की आशा मिलती है,  जिसे हिंदू साम्राज्य की हार के बाद शुरू किया गया था।
कुतुब मीनार की नींव कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1199 ई. मे रखवाई और इस स्मारक का नाम भी उन्होने अपने नाम पर रखा। भारत के पहले मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक थे, जिसकी वीरता का शानदार उदाहरण आज भी उपस्थित है। यह भारत का सबसे उँचा इकलौता टॉवर है और एक अफगान शैली का प्रतीक है। यह एक कीर्ति विजय स्तंभ की तरह वहाँ खड़ा है। यह 5 मंजिल की स्मारक है, हर मंज़िल के छज्जों को बारीक बारीक नक्काशी से सजाया गया है। तीन मंज़िल बनने के बाद कुतुबुद्दीन की मृत्यु हो गयी और बाकी की दो मंज़िल उसके उतराधिकारी ने बनाई। पहली 3 मंज़िल लाल बलुआ पत्थर से बनाई गई है और बाद की 2 मंज़िल संगमरमर और बलुआ पत्थर से बनी है। यह पूरी इमारत एक ही पत्थर से बनी है जिसमे न तो कोई सीमेंट है ना ही कोई जोड है। यह 72.5 मीटर ऊँची है। पर्यटक इस ऊँची इमारत की ओर आकर्षित होते है ओर दूर से दूर से इस अद्भुत वीर स्मारक को देखने आते है। इसे यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत का दर्जा मिला है।
कुतुब मीनार मे कई दिलचस्प संरचनाएं भी है जेसे लौह स्तम्भ, अलाई दरवाज़ा, अलाई मीनार, कूव्वतुल-इस्लाम मस्जिद आदि। इसके आँगन के केंद्र मे अद्भुत लौह स्तम्भ मौजूद है जो ध्वजा स्तम्भ के रूप मे विष्णु मंदिर का चिन्ह है। यह 7.2 मीटर लंबा लोहा खंबा जिस पर सदियों से कोई जंग मौजूद नही है। जो वर्षो से बारिश, धूल, आँधी, तूफान से खुद ब खुद अपनी रक्षा कर लेता है। ऐसी पवित्रता की पहचान है यह लोहा जिस पर हज़ारो साल बाद भी कोई जंग नही लगी। यह कोई नही जनता केसे। ऐसा कहा जाता है की अगर कोई अपने उल्टे हाथो से स्तम्भ को घेर लेता है तो उसकी मन्नत ज़रूर पूरी होती है। अर्थात यह मीनार सिर्फ़ जीत के टॉवर के रूप मे नही बनाया गया बल्कि इस्लाम ओर गुलाम वंश की सैन्य शक्ति के न्याय का प्रतीक है।